मनुष्य के जीवन की हर एक समस्या का समाधान,
माँ कामख्या के पास है। जरूर पढ़ें और लाभ ले।
यह एक कहानी ही नही, विधि भी बताई गई है।
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योनिपीठ कामगिरी कामाख्या यत्र देवता उमानंदो भैरवः ।

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योनि रूपायाःकामाख्या देवयाःस्वरूपम,
भगवान शिव ने बताया कि-
योनिरूपा महाविद्या कामाख्या वरदायनी यानि वरदायनी महामाया कामाख्या है, वह नित्य वर और आनंददात्री है तथा ऐश्वर्य को बढ़ाने वाली है।
वह सबकी जननी और रक्षा करने वाली है।
वह सदैव स्थूल एवं सूक्ष्म सभी की मूल भूत शक्ति स्वरूपा, कल्याणकारणी हैमैं उन्ही महाविद्या, विराट स्वरूपा माँ कामाख्या का विधान एवं तंत्र बताता हूं।

माँ कामाख्या में ही, मंत्र भी है।
तंत्र भी है।
तांत्रिक भी है। और यंत्र भी है।
पुराणों में वर्णित-देवी भागवत पुराण, तंत्रशास्त्र,योगनी तंत्र,कालिका पुराण,।

भगवती ने भगवान शिव की आखों में देखा प्रभु आप बातये, तब महादेव ने कहना आरम्भ किये,
विश्व मे साधक लोग जिन विविध सिद्धियों को साधना के द्वारा प्राप्त करते है,
उन सभी विधाओं के क्षेत्र में एक मात्र कामाख्या ही अभीष्ट फलदायनी है।
प्रायः जो मनुष्य माँ कामाख्या के प्रति उदासीन रहता है वह तीनो लोको में निंदित होता है,क्योंकि एक मात्र कमात्मिका महामाया कामाख्या को छोड़कर अन्य कोई भी सिद्धिरूपी संपदा प्रदान करने में सक्षम नही है।
महाविदारूपनी सभी महादेवियों कामाख्या की ही प्रतीक है।

हे प्रिय! अपने हृदय में ध्यान कर उन सबको स्वयं देखलो।
तीनो लोको में कामाख्या के अतिरिक्त अन्य कोई नही है।
जिस प्रकार चन्द्रमा की कांति प्रकट होती है, फिर लुप्त हो जाती है और पुनः प्रकट हो जाती है, उसी प्रकार स्थावर और जंगम तथा नित्य और अनित्य जो कुछ भी है, वह सब कामाख्या के बिना उत्पन्न नही होता, यह सर्वथा सत्य है।

कामाख्या च सदा धर्मः कामाख्या चार्थ एव च।
कामाख्याकाम संपतिः कामाख्या मोक्ष एव च।।
निवारणम् शैव देवेशि शैव सायुज्यमिरिता।
सालोक्यं सहरूपं च कामाख्या परमा गतिः।।

अर्थात: कामाख्या सदैव धर्म एवं अर्थस्वरूपा है।
कामाख्या काम और मोक्षस्वरूपा है।कामाख्या ही निर्वाण, मुक्ति और कामाख्या ही सायुज्य मुक्ति कही गई है। कामाख्या ही सालोक्य और सरूप्यस्वरूपा है।कामाख्या ही श्रेष्ठ गति है।
भगवान शिव आगे बताते है-

शिवता ब्रह्मता देवि विष्णुता चंद्रतापि च।
देवत्वं सर्वदेवानां निश्चित् कामरूपणी ।।
सर्वासामपि विधानां लौकिकं वाक्यमेदच ।
कामाख्या महादेव्याः स्वरूपं सर्वरूपं हि।।

अर्थात- हे देवी! ब्रह्मतत्त्व, विष्णुतत्व, शिवतत्त्व, चंद्रतत्व या समस्त देवताओं का देवतत्व जिस शक्ति में निहित है, वही कामरूपनी कामाख्या है।
सभी देवताओं का जो लौकिक वाक्य है, वही कामाख्या है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार,
दक्ष प्रजापति द्वाराआयोजित यज्ञ में भगवान शिव की निंदा सुनकर जब सती ने ग्लानि, पश्चाताप और क्रोध में योगाग्नि में प्राणोत्सर्ग कर दिया तब उनकी मृत देह को कंधे पर लिये महादेव उन्मत भाव से नृत्य करने लगे।
उनके तांडव से प्रलय की-सी स्तिथि उत्पन हो गई।
समूची सृष्टि में हाहाकार मच गया।
तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु,उन्मत शिव के पीछे हो लिये और अपने शुदर्शन चक्र से सती के शव को काट-काट कर गिराने लगे।
सती के शरीर के कटे हुये अंग जहाँ जहाँ गिरे वे सभी स्थल शक्ति पीठ हो गए।
ऐषु स्थानेषु सर्वत्र देवी स्थानानि भूपते।
दर्शनात् पाप हारिणि वसंति नियमेन च।।

और सभी शक्ति पीठो में स्वयं भगवान महादेव भैरव रूप से विरजमान हुये।
कामरूप में सती के शव की महामुद्रा काटकर गिरी, अतः कामाख्या महाशक्ति पीठ माना जाता है।
तांत्रिक-मांत्रिक इसे अपनी साधना स्थली बनाय हुये है।

कामाख्या एवं कामरूप क्षेत्र का विस्तृत विवरण कालिका पुराण में है।
भगवती कामाखया नीलपर्वत वासिनी है।
महामुद्रा अर्थात योनिमण्डल गिरने के कारण यह तीर्थ स्थान तीर्थो में चूड़ामणि माना जाता है।
ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित यह स्थान महायोग स्थल के रूप में समूचे जगत में सुविख्यात है।
इस पर्वत पर सती का योनि मंडल गिरकर नील वर्ण हुआ था।
इसलिये यह पर्वत नीलांचल नाम से जाना जाता है।

सती का योनिमण्डल नीलांचल के ऊपर गिरकर पत्थर बन गया, उसी प्रस्तारमय योनि में माँ कामाखया देवी नित्य निवास करती है।माँ कामाखया आकर उनके जो भक्त, श्रद्धालु, साधक,या योनि शिला को स्पर्श करते है उनकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।
ऐसा विश्वास किया जाता है की माँ का स्पर्श पानेवाले लोग अमरत्व प्राप्त कर ब्रह्म लोक में निवास करते है और उन्हें अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यह बात कालिका पुराण में उल्लेखित है।

माँ कामाखया की कथा—

ईसा की सोलहवीं शताब्दी के प्रथमांश में कामरूप प्रदेश के राजाओं में युद्ध चल रहा था।
उस युद्ध मे कोच राज विश्वसिंह विजय श्री प्राप्त करके समस्त कामरूप के एकक्षत्र राज्याधिपति हुए।
इस बारे में एक दंत कथा का उल्लेख मिलता है।
वे अपने भाई के साथ बिछुड़े हुये सैनिक की तलाश करते करते भटकते हुये, नीलांचल पर्वत के शिखर पर पहुच गए।
थकान से एवं प्यास से उनका बुरा हाल था।
शिखर पर अवस्थित एक वटवृक्ष के नीचे विश्राम के विचारसे जा बैठे।
वहाँ कोई बस्ती भी नही थी।वे इधर उधर देखकर पानी की खोज कर रहे थे कि उन्हें वहा एक वृद्धा दिखाई दिया, उन्होंने उससे पूछा तो उसने मीठे पानी का झरना दिखाया।दोनो भाइयो ने झड़ने का पानी पिया।वृद्धा स्त्री ने ही उन्हें बातों बातों में बताया कि वटवृक्ष के नीचे जो मिट्टी का टीला है वहाँ कभी मातृस्थल था और आज भी कोच जाति के लोग उस स्थल की पूजा करते है।
कहते है कि उस स्थल पर जिस इष्ट का स्थान था वे आज भी जागृत है और जिस पर प्रसन्न हो जाते है, उसकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है, और इतना कहकर वृद्धा स्त्री विलुप्त हो गई।
विश्व सिंह ने उस स्थल पर आकर इष्ट का स्मरण किया और अपने बिछड़े सैनिकों से मिलने की कामना की।
कहते है कि कुछ ही पल में उनके सैनिक वहाँ आ गए,।
तब उन्हों ने मन्नत मांगी की” यदि मेरे राज्य में कोई उपद्रव नही होगा तो मैं यहाँ स्वर्ण मंदिर का निर्माण करूँगा।
विश्व सिंह को महादेव के पुत्र रूप में उल्लेखित किया गया है, योगनी तंत्र में।
आज भी विश्व सिंह के वंशज कुचविहर में है।
कहते है कि राजा विश्व सिंह के राज्य में शांति स्थापना की कामना भी शिघ्र ही पूर्ण हुई तो उन्होंने उस परम पुनीत स्थल पर माँ का मंदिर का निर्माण करवाना प्रारम्भ किया।
उसी दौरान खुदाई के समय माँ की महामुद्रा प्राप्त हुई।
राजा विश्व सिंह ने महामुद्रा की प्रतिमा के बारे में पंडितो से विचार विमर्श किया तो निश्चित हुआ कि वह स्थल कामाखया पीठ है-

【 आप कही भी किसी काम से जा रहे है तो मन ही मन माँ कामाखया का मंत्र जपते जाय, तो मंत्र है—- त्रीं त्रीं त्रीं — बस इतनाही बोलते जाना है,
आपके सारे बिगड़े काम बनेंगे 】

वह स्थल कामाखया पीठ है और वह प्रतिमा माँ कामाखया की है।
मंदिर का निर्माण प्रारंभ हुआ। दिन में जितना निर्माण होता था, रात में ढह जाता था।
यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा तो राजा विश्व सिंह अत्यंत चिंतित हुये।
तब उन्हों ने माँ कामाखया की आराधना करके यह जानने का प्रयास किया कि ऐसा क्यों हो रहा है?
माँ ने स्वयं प्रगट होकर राजा को बताया कि तुमने स्वर्ण मंदिर बनबाने का निश्चय किया था और अब ईट- से मंदिर क्यो बना रहे हो?
तब राजा ने अपनी आर्थिक विपन्नता को स्पष्ट किया और प्रार्थना की कि माँ ही कोई उपाय बताय जिससे मंदिर बन सके।
तब परम उदार माँ ने सुझाव दिया कि प्रत्येक ईट के नीचे रत्ती भर स्वर्ण रखकर मंदिर का निर्माण कराओ तो तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।
राजा ने ऐसा ही किया और मंदिर पूर्ण हुआ।
इस तरह महर्षि वशिष्ठ के शाप से लोप हुई माँ कामाखया पुनः प्रकट हुई।

【 अगर आप की आय का स्रोत, आय बढ़ने का नाम नही ले रहा है, किसी ने आपके कारोबार को बंधवा दिया है, ग्राहक की संख्या कम हो गई है,
पारिवारिक परेशानी, घर मे तरह तरह की संकट, उत्पन्न होता हो, जिस काम के लिये निकलते है, और शाम को निराशाजनक ही वापस लौट आते है, यानी जहाँ जाऊ खाली हाथ आउ, घर मे कितना भी करो बरकत नही,सारे परिवार में मेल जोल नही, पति पत्नी में अनबन, हर तरह की परेशानियों का समाधान माँ कामाखया है।
बस माँ पर विश्वास रखो किसी के कहने सुनने पर नही जाओ और 41 दिन माँ की सेवा करो और यह मंत्र जपो किसी भी विधि का विचार ना करो।
मंत्र——
विष्णु प्रिया लक्ष्मी!शिव प्रिया सती से प्रगट हुई कामाक्षा भगवती!
आदि शक्ति युगल मूर्ति महिमा अपार,
दोनो की प्रीति अमर जाने संसार।
दोहाई कामाक्षा की, दोहाई दोहाई।
आय बढ़ा, व्यय घटा, दया कर माईं।
ॐ नमः विष्णु प्रियायै, ॐ नमः शिव प्रियायै।
ॐ नमः कामाक्षायै ,ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा। 】
अति सुंदर मंत्र है, लेकिन आप भी अति सुंदर विचार से उपाय करें और लाभ उठायें।

तो कहानी भी बतानी है तो आगे की कहानी सुने
राजा विश्व सिंह की मृत्यु के बाद बंगाल के नवाब सुलेमान के सेनानायक कालापहाड़ ने कामरूप पर आक्रमण कर दिया और मंदिर को तहस नहस कर दिया।
तब राजा विश्व सिंह के सुपुत्र नृपति नरनारायण ने ( नामांतर मल्लदेव) अपने अनुज शुक्लध्वज ( चिलाराय) द्वारा मंदिर का निर्माण पुनः करवाया गया और मंदिर में पूजा पाठ के लिये केदूकलाई नामक एक साधक ब्राह्मण की नियुक्ति कर दी गई।
जनश्रुति है कि जब वह साधक ब्राह्मण घंटा बजाकर मां की आरती करता था तब माँ स्वयं प्रकट होकर प्रसन्न भाव से वाद्य के ताल पर नृत्य करने लगती थी।
किसी तरह यह बात राजा नृपति नरनारायण को पता चल गया।
तब राजा ने ब्राह्मण पर जोर डाला कि वह देवी का साक्षात दर्शन कराय।
साधक ब्राह्मण ने राजा को अवगत कराया कि संध्या कालीन आरती के समय वह पधारे और मंदिर की खिड़की से मां की नृत्यमुद्रा को निरखे।
राजा ने ऐसा ही किया।
माँ से यह बात छुप न सकी।वे पहले तो ब्राह्मण पर क्रोधित हुई और उसका शिरच्छेद कर दिया।फिर राजा को शाप दिया कि उसके राजवंश का कोई भी व्यक्ति कामाखया धाम या नीलांचल पर्वत की ओर निहारने का उपक्रम करेगा उसका सिर कट जायगा।
आज भी कोच राजवंशी कोई भी व्यक्ति इस परिक्षेत्र में नही आता ।
माँ के शाप के बाद कोचवंशीय राजघराना कामाख्या के प्रति उदासीन हो गया था।
कालांतर में कामरूप क्षेत्र अहोम राजाओ के अधिकार में आ गया।
तब राजा ने नदिया शांतिपुर से एक शाक्त साधक को बुलाकर राजगुरु के पद पर प्रतिष्ठित किया।
राजगुरु ने ही माँ कामाख्या की सेवा टहल की और कामाख्या धाम में रहने लगे।
आज भी उन्ही के वंशज इस मंदिर के पुजारी है।

माँ कामाख्या के दर्शन हेतु तीर्थयात्री गण प्रायः यह स्तुति करते जाते है।
स्तुति है—–/

कामाख्ये काम सम्यज्ञे कामेश्वरी हरि प्रिय।
कामना देहि मे नित्यं कामेश्वरी नमोस्तुते।।
कामदे कामरूपख्ये सुभगे सुर सेविते।
करोमि दर्शनं देव्या: सर्वकामार्थ सिध्दये।।

माँ के सच्चे दरवार में भक्ति भाव से पूजन करने से पुत्र, धन,विधा, भूमि और नाना प्रकार के लाभ प्राप्त होते है।
इस धाम में माँ महामाया कुमारी रूप मे विधमान है, सो सभी कृत्यों में कुमारी पूजन को श्रेष्ठता प्राप्त है।
इस बारे मे कहा भी गया है::::::

ॐ सर्वविधा स्वरूपा हि कुमारी नात्र संशयः।
एका हि पूजिता बाला सर्व हि पूजितं भावते।।

यानि कुमारी सर्व विधा स्वरूपा है,इसमे संदेह नही है। एक कुमारी पूजन करने से सम्पूर्ण देव देवियों की पूजा का फल प्राप्त होता है।
माँ महामाया से याचक जैसी याचना करते है, उसी के अनुरूप मां उसकी मनोकामना पूर्ण करती है।

माँ के सच्चे दरवार से आजतक कोई खाली हाथ नही लौटा है।माँ प्रसन्न होकर अपने भक्तों एवं श्रद्धालु को वह सब दिया है जिसकी वे परिकल्पना तक नही कर सकते।
तंत्रमंत्र की अधिष्ठात्री माँ कामाख्या आज भी लोगो के मन मे त्रास से मुक्ति दिलानेवाली देवी के रूप में पूजी जाती है।